A small poem that talks about the unadulterated joys of childhood, which becomes a luxury later on in life.
बारिश की वोह पहली बून्दें
जो आसमान से गोध में आ गिरे
फिर मिट्टी के संग बून्द मिल जाए
एक ताज़ी सि नयि ख़ुशबू जगाये
याद आ रहे हैं वोह लम्हे
बचपन की नादान शरारतें
वोह माँ का प्यार से समझाना
वोह बाबूजी का प्यार से डांटना
आनेवाले कल की परवाह न करना
याद आ रहे हैं वोह लम्हे
अब शरारतें नादान नहीं लगती
नाहि बारिश लगती है प्यारी
मिट्टी की खुसबू जैसे भूल गया हूँ मैं
अपनी ज़िन्दगी में ऐसे उलझ गया हूँ मैं
अब सिर्फ यादों में खूबसूरती समेट कर रह गयी
उन यादों से बचपन कि हसीं लम्हों को चुरा के
बेपरवाह बेफिक्र अपनी बचपन की ज़िन्दगी
एक बार फिर से जीना चाहता हूँ मैं
- नारायण
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